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छोटा पॅकेट, बड़ा धमाका..

9 जुलाई  20, मुंबई
छोटा पॅकेट, बड़ा धमाका..
कई सालों पहले कपड़े धोने वाले साबुन की ऐड्वर्टाइज़ आया करती थी. ट्रैफिक सिग्नल पर एक स्कूलिछात्र अपनी साईकिल पर एक कार के पड़ोस मे खडा रहता है, लेकिन कार चालक उसे गरूर से देखता है. छात्र कहता है, 'आज दो पहिए पर हू, कुछ ही सालो मे, मेरी भी चार पहिया गाड़ी होंगी'. आखिर मे साबुन कंपनी अपना संदेश देती है. ये विज्ञापन काफी आकांक्षापूर्ण (aspirational) था. भविष्य मे होनेवाली प्रगति किसी व्यक्तिविशेष या गुट की जागीरदारी नहीं ये बतलाता है, अधोरेखित करता है. छोटे गाव-खेडे से आए हुए कई खिलाड़ी विश्वस्तर पर अपना, परिवार और देश का नाम रोशन कर चुके. छोटे कस्बे से आए हुए कई वैज्ञानिक, विधिज्ञ, लेखक, कलाकार, राजनेता, व्यापारी, डॉक्टर, अपने अपने क्षेत्र मे नाम जमा चुके है. आज भी उनका दुनिया लोहा मानतीं है. खैर.

छोटा पैकेट..
व्यापार क्षेत्र मे भी सूक्ष्म, लघु, छोटी, मंझली और बड़ी कंपनिया होती है. लघुउद्योग किसी भी अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग होता है. भारत का लघु और छोटा उद्योग क्षेत्र काफी बड़ा है, इन्हें एमएसएमई भी कहा जाता है. इनको मार्गदर्शन, मदत और बढावा देने के लिए एक विशेष मंत्रालय भी है. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) मौजूदा उद्यमों को सहायता प्रदान करने और नए उद्यमों को प्रोत्साहित करके संबंधित मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों के सहयोग से, खादी, ग्रामोद्योग और कयर उद्योग सहित एमएसएमई क्षेत्र की वृद्धि और विकास को बढ़ावा देकर एक जीवंत एमएसएमई क्षेत्र की कल्पना करता है.

कोरोना वैश्विक महामारी से अर्थव्यवस्था को एक तरह से नुकसान हुआ है, सबसे ज्यादा छोटे और मझोले उद्योगों का हुआ है. उन्हें उभरने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत आर्थिक सहायता के साथ साथ, इस क्षेत्र की परिभाषा भी बदली गई है. उसका परिवेश बढ़ाया गया है. अब सौ करोड़ तक के आय वाली कंपनी छोटी और मझोली कंपनी के दायरे मे आएगी. इससे उन्हें फायदा ही होंगा. आज के छोटी मझौले उद्योग भविष्य के बड़े उद्योग होते है.

कई उदाहरण है, जैसे घडी डिटर्जंट, फेना डिटर्जंट. 1988 मे शुरू हुई, 'पहले ईस्तेमाल करे, फिर विश्वास करे' कहने वाली घड़ी डिटर्जंट आज सालाना आठ हजार करोड़ रुपये का कारोबार करती है. या फिर 'फेना ही लेना' का आग्रह करने वाली कंपनी फेना डिटर्जंट कंपनी आज करीबन पाच सौ करोड़ का कारोबार करती है. बनियान बनाने वाली कंपनियां जैसे लक्स, अमूल, डॉलर जैसे छोटे ब्रांड लगने वाली कंपनियां 275 करोड़ से 1200 करोड़ तक का सालाना कारोबार करती है.
पाच लाख रुपए के साथ 1999 मे नोएडा मे एक छोटे यूनिट मे शुरू हुई केंट आरओ आज सालाना करीबन 830 करोड़ का कारोबार करती है. 'आया नया उजाला, चार बूंद वाला' कहकर सफेद कपड़ों की सफ़ेदी बढ़ानेवाला उजाला लिक्विड बनाने वाली ज्योथी लैब आज 1700 करोड़ का कारोबार करती है. बिस्कुट बनाने वाली कंपनी प्रिया गोल्ड की भी अपनी कामयाबी है. सभी कंपनियों ने शुरुआत छोटी की, ग्राहक को क्या चाहिए ये समझा, फिर अपने उत्पादों को विश्वासार्ह बनाया, डिस्ट्रीब्यूटशन और ब्रांड विज्ञापनों पर ध्यान दिया. आज ये सब भारत के चुनिंदा ब्रांड मे शामिल है.

इनकी फेहरिस्त (लिस्ट) काफी बड़ी है. आज, उपरोक्त सभी कंपनियां,अपने-अपने क्षेत्र की भारत मे स्थापन हुई प्रमुख विदेशी कंपनियों को टक्कर दे रही है. चाहे वो प्रोक्टर एंड गैंबल हो या फिर हिन्दुस्तान युनीलिवर या कोलगेट हो.

कितना बड़ा है भारत का लघु उद्योग क्षेत्र?
  • एक अनुमान के अनुसार भारत मे 45 लाख लघु और मध्यम उद्योग है (100 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार).
  • भारतीय अर्थव्यवस्था मे लघु उद्योग काफी महत्वपूर्ण है. पूरी अर्थव्यवस्था का 45% उत्पाद ईन क्षेत्रो से आता है.  
  • निर्यात का 40% हिस्सा लघु और मध्यम उद्योगों से आता है
  •  एक अनुमान के अनुसार आज इस क्षेत्र में करीबन छह करोड़ से ज्यादा लोग काम करते है 
  • रोजगार के तेरह लाख नए मौके हर साल निर्माण करता है.  
  • ज्यादा से ज्यादा लघुउद्योग दूसरी और तीसरी टियर (स्तर) के शहरो मे बसा है.
महाराष्ट्र की स्थिति...
महाराष्ट्र देश का सबसे उद्यमशील राज्य है . महाराष्ट्र मे करीबन दो लाख से ज्यादा लघु और मध्यम उद्योग है (100क रोड़ रुपये का सालाना कारोबार). पिछले पाच सालो मे इनकी स्थिति मे सुधार आया है. पिछले साल तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए मुख़्यमंत्रो रोजगार योजना  लांच की थी जिसका उद्दिष्ट  राज्य में आने वाले पांच सालो में १० लाख नए रोजगार  निर्माण करना था -इसमें महिलाओ को 30% आरक्षण दिया गया था. 

हालांकि ज्यादातर उद्योग मुंबई, पुणे, नागपूर, नाशिक, औरंगाबाद या जलगाव जैसे शहरी भागों के पास केंद्रित है. लेकिन कोल्हापूर, सातारा, सांगली, अमरावती या अकोला भी पीछे नहीं है. नागपुर का वाघमारे मसाला हो, अमरावती का घरकुल चिकन मसाला हो, या पुणे की चितळे बंधू की मिठाई, या पीताम्बरी के बर्तन धोने के प्रोडक्ट, ये सभी अपने अपने वर्गों मे श्रेष्ठत्व की ओर अग्रेसित रहने की कोशिश करते दिखते है. मुंबई की कॅमलिन और विको कंपनियां तो सभी को पता है. इनके अलावा कई उद्योग ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स, प्लास्टिक या दवाई क्षेत्रो की बड़ी बड़ी कंपनीयों के लिए कच्चा माल या पार्ट्स बनाते है, कई कंपनियां निर्यात भी करती है.

हम भी है राह मे आप के साथ..
जब बात छोटे उद्योगों की चल रही हो तो खादी और ग्रामोद्योग (KVIC) को कैसे भुला जा सकता है. पिछ्ले साल करीबन 88000 करोड़ रुपये का कारोबार ग्रामोद्योग से हुआ था. खादी और ग्रामोद्योग  (KVIC) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) के अंतर्गत आता है. मधुमक्खीपालन (हनी मिशन), पोल्ट्री उद्योग, बांबू उद्योग, खादी के वस्त्र, सौर ऊर्जा, अगरबत्ती बनाना और विविध तरह कुटीर उद्योगों को बढावा देने वाले कार्यक्रम KVIC के अंतर्गत कार्यान्वित (implement) किए जाते है. जरूरतमंद उद्योगकर्मियों को कम ब्याज दरों में पूंजी और सभी जरूरी सहायता मुहैया कराई जाती है. लगभग हर जिले में इनके अधिकारी होते है, नए या जरूरतमंद उद्योगकर्मी इनकी सहायता ले सकते है.

क्या करना चाहिए सूक्ष्म और छोटे उद्योगों ने?
  • अपना उत्पाद (प्रोडक्ट) अच्छे से समझे
  • विश्वसनीय तरीकों (स्वतंत्र) से उसका ग्राहक और उसकी जरूरतें और उसकी विशेषताएं समझे. इसे कस्टमर सेग्मेंटेंशन कहते है
  • अपने प्रॉडक्ट की मार्केट और उसकी इंडस्ट्री के बारे मे विस्तृत जानकारी इकठ्ठा करे, और उसे लगातार अपडेट करते रहे
  • अपने इंडस्ट्री मे अपना उत्पाद दूसरे प्रोडक्ट से कैसे अलग है ये कस्टमर को समझाने की कोशिश करे, इसे डिफरेन्शीऐशन कहते है
  • विज्ञापन मे नयापन और अलगपना जितना जरूरी होता है, उतनी ही महत्वपूर्ण होती है विश्वासार्हता (advertising should be new, unique and believable). 
  • विज्ञापन मे बड़े-बड़े दावे करने से अच्छा ,अपना प्रोडक्ट अच्छा कैसे है यह ग्राहको और दुकानदारों को समझाने की कोशिश करे
  • कीमत कम रखे तो ग्राहक खरीदेगा ही ये मिथ्या है 
  • क्वालिटी, पॅकिंग, सेल्स सर्विस और ब्रांडिंग भी जरूरी है 
  • सोची समझी जोखिम उठाने के लिए तैयार रहे .
उपरोक्त सभी बातों को समझकर एक एक विस्तृत योजना बनाकर अपना उद्योग बढाए. जब आपका एक प्रोडक्ट हिट हो जाता है, तो फिर नया प्रोडक्ट उसी लाइन मे (प्रोडक्ट extension) या फिर उसी ब्रांड का अलग प्रोडक्ट (ब्रांड extension) कर सकते है. या फिर फॉरवर्ड और बॅकवर्ड / अगला या पिछला इंटीग्रेशन कर के अपना दायरा बढ़ा सकते है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ऐसे ही बड़ी हुई है.

ग्राहक (व्यक्ति हो या कंपनि) से जुड़े रहना.. 
हर उद्योग मे ग्राहक की भूमिका की विशेष होती, इसलिए उनसे जुड़ाव रखना, उनकी पसंद, नापसंद और अपेक्षाएँ समझना जरूरी है. बड़ी कंपनिया समय-समय पर नए उत्पाद के लिए या फिर अपने उत्पाद के बारे मे ग्राहक के विचार समझने के लिए स्वतंत्र संस्थाओ से ग्राहक सर्वेक्षण (Customer Feedback survey) कराती है. छोटे उद्यमी अपनी जरूरत के अनुसार इस तरह की प्रणाली विकसित कर सकते है. लेकिन ये जरूरी है, फायदेमंद ही रहेगा.

समझिए अपनी इंडस्ट्री को.. 
हर इंडस्ट्री पर आंतरिक या बाहरी तत्वो का असर होता है, हर उद्यमी को इन्हें समझना जरूरी होता है. इसे इंडस्ट्री अनैलिसिस (Industry Analysis) कहते है. कौन से है यह तत्व
  • हर उद्योग मे आंतरिक स्पर्धा होती है, जिसे कॉम्पिटिशन कहा जाता है
  • ज्यादातर हर उत्पाद को सब्स्टिटूट होता है, इससे आपके उत्पाद को धोका माने आपके उद्योग को धोका. इसे सब्स्टिटूट से खतरा कहते है (Threat from substitute) 
  • कोई भी उत्पाद बनाने के लिए कच्चा माल (raw material) लगता है. इनके सप्लायर्स आपका उद्योग चौपट कर सकते हैं, इसलिए वे हमेशा उनके ग्राहक से सौदेबाजी करते रहते हैं. इसे इनकी बार्गेनिंग पावर (bargaining power of suppliers) कहते है
  • आपके उत्पाद जैसे उत्पाद बनाने वाले और भी नए उत्पादक बाजार में सकते हैं. इसे नए उत्पादकों से खतरा कहते हैं (Threat from new entrants)
  • हर ग्राहक (व्यक्ति हो या कंपनि) की सौदेबाजी करने की अपनी एक क्षमता होती है. इसे इनकी बार्गेनिंग पावर (bargaining power of customers) कहते है
हर उद्यमी ने उपरोक्त तत्वो को समझकर, उनके प्रभाव को आंक कर, विस्तृत आकलन करते रहना चाहिए. तभी वो लंबे समय तक कामयाब होते रहेंगे

क्या है इनकी परेशानियां?
उद्योग व्यापार मे जहा एक तरफ प्रगति के मौके आते है, वही पर परेशानियाँ भी होती है. इनमे प्रमुख -
  • अपने उत्पाद के इंडस्ट्री, मार्केट, ग्राहक की पूरी जानकारी ना होना 
  • उपयुक्त मार्केटिंग प्लॅटफॉर्म का उपलब्ध ना होना
  • E-कॉमर्स जैसी सुविधा की प्राप्ति ना होना
  • बँक या सरकारी योजना की पूरी जानकारी ना होना
  • पूंजी की कमी या निवेशक के पास पहुचने के कम अवसर
  • नई तकनीक का अभाव या पूंजी की कमी
  • उपरोक्त सभी विषयों के लिए शहरों मे व्यावसायिक मदत मिल सकतीइंटरनेट का उपयोग कर आप आजकल हर प्रकार के विशेषज्ञ के पास पहुच सकते हैं.
जहां चाह वहा राह..
एक तरफ छोटे उद्योगों को कुछ परेशानियां है, दूसरी तरफ प्रगति के अवसर और सहायता के मौके भी उपलब्ध है. इनका मिलाप होना जरूरी है. कई स्टार्टअप, छोटे उद्योगों को तकनीक या पूंजी मुहैया कराने के अवसर निर्माण करते है. कई बार खुद से देते हैं या फिर उनके बीच की लिंक बनते है. भारत सरकार भी छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नरत है

"आत्मनिर्भर भारत" की अहम भुमिका..
वैश्विक कोरोना महामारी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाला लघु और मध्यम उद्योग आज संभ्रमावस्था मे जरूर है, लेकिन, भारत सरकार ने "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" अभियानों के अंतर्गत छोटे उद्योगों को ज्यादा से ज्यादा आधार कैसा मिलेगा इसका खास खयाल रखा गया है. इन्हें उबारने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये की कर्जव्यवस्था बनाई गई है. सरकार की तरफ से इन कार्यक्रमों की जानकारी छोटे से छोटे उद्योगकर्मियों तक उन्हें समझेगी ऐसी सुलभ तरीके से पहुंचानी चाहिए. उद्योग कर्मियों ने भी निराश या हताश ना होकर, अपनी बँक या अपने जिले मे स्थित सरकारी अफसरों या संवादिनीयों से इसके बारे मे विस्तृत जानकारी ले कर भारत निर्माण मे अपना सहभाग बढाए. कोई भी उद्योगकर्मी या उद्योग छोटा या बड़ा नहीं होता. छोटी या बड़ी रिस्क / जोखिम होती है. सोच समझ कर ली हुई रिस्क / जोखिम, चंद सालो मे लाख को करोड़ या करोड़ को सौ करोड़ तक पहुंचा सकती है. उद्योग की जानकारी, आत्मविश्वास, सचोटी और जोखिम लेने की चाहत ये पाने मे मदत करती है. 

मजबूत कांधोंपर है जिम्मेदारी...
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) की जिम्मेदारी उद्यमशील राजनेता, महाराष्ट्र के चहेते श्री नितिन गडकरी के पास है. भारत निर्माण मे महत्पूर्ण भूमिका निभाने वाली सड़के और लघुउद्योग, गडकरीजी के अनुभवी कंधों पर है. उनका उद्यमशील स्वभाव और कल्पक बुद्धी, और भारत सरकार की कटिबद्धता लघुउद्योगों को वैश्विक महासंकट से जरूर बाहर लाएगा. हो सकता है थोड़ी देर लगे, लेकिन सफलता का सवेरा तो आना ही है. 

चलते चलते..
2025 तक भारत को पाच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने मे इनका बहुत बड़ा योगदान होगा. अगर अर्थव्यवस्था को एक संगीत की धुन समझे, तो सूक्ष्म, छोटे, मझोले, मध्यम, बड़े, बहुत बड़े और विशालकाय उद्योग उसके सुर है. इन सातसुरों की सरगम जब बनती है तो वो सुरीली बनती है. ठीक वैसे ही, जैसे फिल्म परिचय (1972) मे, गीतकार गुलज़ार (संपूरण सिंह कालरा), संगीतकार राहुल देव बर्मन, गायक किशोर कुमार और आशाताई भोसले ने मिलकर एक जबरदस्त सुरीली सरगम बनाई थी..
"सा रे के सारे को लेकर गाते चले..
सरगम हो गई पूरी, अब क्या होगा आगे
सरगम के साथी सरगम की धुन पर गाते चले".

उद्यमी रहे, सृजनशील बने, आगे बढ़े..
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम - ये गुण जिन व्यक्तियों के पास होते हैं उनकी सहायता देव और दैव (किस्मत) दोनों करते हैं .

धनंजय मधुकर देशमुख, मुंबई
Dhan1011@gmail.com 
(लेखक एक स्वतंत्र मार्केट रिसर्च और बिज़नेस स्ट्रेटेजी एनालिस्ट है. इस पोस्ट मे दी गई कुछ जानकारी और कविता / गीत  / श्लोक इन्टरनेट से साभार इकठ्ठा किए गए है. छोटे और नए उद्यमियों को सशक्त बनाने के लिए बौद्धिक योगदान देने में इन्हे आनंद होंगा.)

Comments

  1. बहोत ही सूक्ष्म अभ्यास कर यह लेख लीला गयाँ है। स्वदेशी उद्योगस्थिती वर्णन कर बतायें उपायों का अवलंब सभी उद्योजकनो ने करना चाहिये। आत्मनिर्भर भारत की और यह यशस्वी कदम होंगा, ऐसा मुछे विश्वास है।
    सौ. मृणालिनी राजेश वाघमारे

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    Replies
    1. आपके समय और अभिप्राय के लिए सहृदय धन्यवाद ताई. 🙏

      Delete
  2. आपने बहोत सूक्ष्म अभ्यास करके विवरण किया है। ये लघु उद्योजकों को फायदेमंद और राह दिखानेवाला लेख साबित होगा।

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  3. Well thought article with necessary context. cont narrative provides a comprehensive view about the potential opportunities for MSME sector. They need to be sincere in their approach, patience and committment beyond business is also necessary. There are numerous examples of home grown brands eventually surrendering to the the brutal power of capitalism, particularly the foreign and MNCs. The list in case compiled can be pretty long, to begin with Camlin mentioned by you besides MTR foods, Anchor Electric were the prominent Indian brands, now owned by MNCs. Divisions within promoter family and lure for big money could be amongst other reasons. Another point I would like to mention is about branding and advertising, particularly young generation get more carried over by celebrity endorsements, who are hired by large brands, henct becomes challenging to withstand their onslaught besides squeezing tactics modern global etailers. Aboy a decade back UPA Government had allowed foreign models and celebrities to endorse brands and participate in advertising, this should be withdrawn forthwith under Atmanirbhar Bharat in the interest of MSME and smaller Indian brands.

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  4. Agree with your observations Rakesh Laad ji. Thanks for your time! 🙏

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